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नीलम तेरा प्यार (1940 Sad Love Story)




        बहुत दिनों बाद वो घर से बाहर निकली थी | हमेशा की तरह खूबसूरत मगर आज चेहरे पर खुशी कुछ अलग ही थी | लेकिन आँखों में चमक कुछ कम थी | कुछ दिन पहले ही शादी पक्की हुई थी | बस उसके बाद घर से बाहर निकलना कम हो गया | दिन भर घर बैठे आने वाली ज़िन्दगी के ख्वाब बुने जाते | उसने अभी तक अपने होने वाले साजन को नहीं देखा था इसलिए ख्वाब तो सजते मगर उनमे रंग नहीं होते | शायद आँखों में कम चमक भी इसीलिए थी |

1940 touching sad story         उसका नाम नहीं पता मगर उसे सब ‘नीलम’ ही बुलाते थे | उसकी आँखें नीलम (रत्न) से भी ज्यादा सुंदर और आकर्षक थी मगर रत्न भी अंगूठी में जड़ने के बाद ही अलंकृत होता है | ऐसे ही उसकी आँखे हो गयी थी, शादी पक्की होने के बाद जैसे उसे उसकी अंगूठी न मिली हो |

        आज बगल वाली दुकान पर मेहंदी ख़रीदने आई थी और जैसे ही वो अपने सपनो में गुम पीछे मुड़ी, किसी से टकरा गयी | मेहंदी का पैकेट हाथ से छुट कर नीचे गिर गया, हाथ में कुछ खुले पैसे भी थे वो भी गिर गए | दोनों की नज़रें मिली और दोनों एक साथ नीचे झुक गए | एक ने मेहंदी उठायी और एक ने पैसे उठाये | उसके हाथ पर मेहंदी का पैकेट रखते हुए दोनों के हाथ आपस में छू गए | लड़के को करंट सा लगा और नीलम के सपनों में रंग भर गए |

        ‘गोविन्द’ यही नाम तो था उसका | कॉलेज में एक साथ पढ़ते थे मगर हमेशा दूर से ही देखा था | कभी पास से गुजरे ही नहीं | ये सब सोचते हुए नीलम ने आँखें बंद की और उसके सपनों में रंग भर गया और सारी दुनिया खूबसूरत लगने लगी | अगले रोज़ से नीलम की खुशी चेहरे, आँखों और उसकी हर अदा से दिखाई देने लगी | घर में सब खुश थे कि नीलम शादी से खुश है मगर यहाँ तो नग किसी और का था, जोहरी भी कोई और था |

        गोविन्द भी घर जाकर नीलम को ही सोचता रहा | वो चित्रकार तो नहीं था ना कवि या लेखक था लेकिन उसने कलम उठायी और कागज़ पर नीलम नाम की माला जपने लगा | नीलम के नाम की माला जपते-जपते बहुत सारे पन्ने भर दिए और एक प्रेमग्रंथ बनने लगा | अजीब प्यार था, एक छोटे से लम्हे में पैदा हुआ और बिना एक-दूसरे की अनुमति के बढ़ता जा रहा था |

        उधर नीलम की शादी के दिन नजदीक आते जा रहे थे | जब शादी को पांच दिन रहे गए तो नीलम की आँख खुली | उसका ख्वाब टुटा और दिल में एक दर्द की आह भर आई | गोविन्द को भी उसकी शादी की ख़बर लग गयी थी | उसने दुकान वाले से दोस्ती कर ली थी और रोज़ सारा दिन दुकान पर बैठा रहता | सबके अंदर एक प्रेमी बैठा होता है | गोविन्द के प्रेम को देख दुकानदार के अंदर का प्रेमी जाग उठा और वो भी गोविन्द के साथ मिलकर घंटो उनके मिलन की योजना बनाता रहता मगर कोई तरीका नहीं मिला |

        नीलम के घर शादी की तैयारियां शुरू हो गयी थी | कुछ रिश्तेदार भी आ गए थे | रात औरतें गीत गाती तो दुकान तक आवाज़ जाती थी | गोविन्द दुकानदार के साथ रात को भी वहीँ सोता था | दुकानदार का अपना कोई नहीं थी, गोविन्द उसका अच्छा साथी बन गया था | वहाँ वो देर रात तक औरतों के गीत सुनता रहता और वे गीत उसे विरह और वियोग के गीत लगते, जिन्हें सुनकर उसकी आँख की किनार गीली हो जाती | यही हाल नीलम का था मगर इतनी खुशियों में उसकी आँखों की नमी किसी को दिखाई नहीं देती |

        दो पंछी अलग-अलग पिंजरों में आज़ाद होने की कोशिश में उड़ते मगर पिंजरे की सलाखों से टकराकर लहूलुहान हो जाते | उनकी मदद के लिए कोई मसीहा नहीं आया | प्रेम की परीक्षा अग्नि परीक्षा सी हो गयी थी | दिन भर नीलम सबके बीच खुश होने का अभिनय करती मगर रात में अकेले होते ही बहुत रोना आता | ऐसा लगता था जैसे दोनों में रोने की कोई होड़ लगी है | गोविन्द भी दुकानदार के सोने के बाद अक्सर रात में उठकर रोने लगता था | लेकिन उनके आंसुओं की नदी का प्रवाह इतना तेज़ होने के बाद भी मिलन की संभावना तक नहीं थी | बीच में एक बड़ा रेगिस्तान पड़ता था | दोनों चल तो पड़े थे मगर रास्ता कोई नहीं जानता था |

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Writer – Parvesh Kumar "PK"





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